योगसे जीवनमें संतुलन|

सुविचार: संतुलन उसे कहते है जो व्यक्ति सहीसमय पर सही निर्णय ले सकता हो |ये बुद्धि और दिलकी एकसाथ उपयोजन करनेकी क्षमता होती है| ये शिश्त और प्यार दोनों की वजहसे आता है| इन दोनोंमेंसे किसी एक का पलड़ा भारी नहीं होता है| मगर दोनों एक समान यानिकी संतुलित होतें है|

अनुभूति : जब हमारे हरेक कार्यमें संतुलन बना रहता है हमारी सबंध सफल हो पाते है| क्यूंकि उसमें दुवाएं भी मिलती है| मुझे तब हर कर्ममें सफलता और दुवाएं साथ साथ अनुभव जीवनमें होता है| मैं अपनेको उस समय सवालों के घेरेमें नहीं बल्कि सेकण्ड मैं उसका हल मिला जाता है|

आत्माकी खुराक : सबसे पहले इस ज्ञान को योग में अनुभव करो| जाननेका मतलब क्या होता है? उसके चार स्टेप्स होते हैं| जो साधकको अनुभवसे उसे ये प्रतीत होने लगता है|
पहला चरण है जाननेका मतलब है माहितीको प्राप्त करना| जिसके द्वारा अपनी बुद्धि नए नए ख्यालों और विचारों को जन्म देता है|
दूसरा चरण है..ज्ञानको जाननेका की वो हमारी श्रुतिमें वो प्रतिबिंबित होने लगता है| तो इस स्थितिमें हमारे सुने हुए ख्याल सब महसूस होने लगते हैं| हर वक़्त जो हमें परेशान करनेवाले ख्याल प्रतिबिंबित नहीं भी हो सकते हैं| हमारी समजको और गहरी करनेके लिए दूसरे लोगोंके साथ विचारविमर्श भी करलेना चाहिए|
तीसरा चरण ज्ञानका है जब हम इस ज्ञान को कर्ममें परिवर्तित करते है तो वो सोच हमारी समझ बनाती है|
और ये सोच हमारी अन्तमें तब बन जाती है जब हम उसे हररोज रोबरोजकी प्रवृतिमें अपनाते है|
तब जाके अन्तिम चरण मैं जाके ये समझ अंत मैं सत्य बना जाता है|

तन मनकी तन्दुरस्ती मिले योगसे| नासे रोग हरे सब पीड़ा|
कष्ट मीटे सब तनका और मनका|
योग सिखाने परमधामसे आया है शिवबाबा|
भगत भर लेरे झोली तू सपने तेरे द्द्वार है भगवाना खडा|

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