हमारा मूल मंत्र ‘ॐ’

इस जगतका जो अस्तित्व है वो अपनेआप में ही सम्पूरण है| नातो हम उसमें कुछ जोड़ सकतें हैं और नाही कुछ नया बना सकतें हैं| इन्सान तो एक मात्र जरिया बनता है| फिरभी वो उस मस्तीमें सदा मग्न रहता है की ये सब मैंने किया…मैंने किया…इस अनंत ब्रह्मांड मैं वो तो एक कडीरूप है| इस के ज्ञान मैं कुछभी अभिवृद्धि नहीं कर सकता है| फिरभी कहता रहता है यह ज्ञान मेरा है…मेरा है| ईसेभी तो अज्ञानता का अन्धकार ही कहेंगे| जब वो इस अँधेरे मैं बुरी तरह फंस जाता है तब उसके जीवनमें ज्ञान का उदय होता है| इसलिए हम ये गाते भी रहते है की “ज्ञान सूरज प्रगटा अज्ञान अंधेर विनाश”..ज्ञानका सूरज तो हमेंशासे ही था किन्तु हमारे मनमें उजास नहीं फैलाया था| ज्ञानतो सदा सर्वदा जहां होना चाहिए था वहीं ही था|
हमारे वेदों ग्रंथो हमारे उसी ऋषि मनीषीयोंकी ज्ञान की नीपज है जिसका ध्यानामग्नावस्था मैं साक्षात्कार मंत्र ईत्यादिरूपमें करते वोही ज्ञान उन्होको प्राप्त हुआ..नादब्रह्म से जैसे ‘ॐ’ मंत्र की उत्पत्ति हुई जो ब्रह्माण्ड का प्रतीकरूप है..जिसकी अक्षरोंसे भी पहले उत्पत्ति हुई थी बादमें उसका अर्थघटन किया गया था की वो दो अक्षरोंका बना हुआ है एक है ‘ओ’ यानी अहम् आत्मा और दूसरा ‘म’ मम ये शरीरम अर्थात मैं एक आत्मा हूँ और ये मम (मेरा) शरीर है…ये मूल मंत्र है| इसी स्थिति मैं टिकना वोही आत्माभिमानी और सच्चे ज्ञानकी स्थिति है जो हमें ध्यान और योगसे प्राप्त होती है| जिसके अनेक फायदे होतें है ..जिसकी हरेक आत्मिक नझरसे देखने लगतें है तो देहभानसे वश होकर जो पापकर्म होते रहतें है हमसे उससे बचे रहतें है..दूसरोंके दु:खदर्द समजनेकी भी क्षमता अपनेमें आती है..सत्कर्म भी हो सकतें है..आदि आदि..कईफायदे होतें है|

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